"अधूरा सा किस्सा "
"अधूरा सा किस्सा "
सच कहूं तो
तुम मेरी पहुंच से बहुत दूर हो
मैं एक आम सा किरदार हुं
तुम ख़ास सी शख्सियत हो
मैं गली के अगले मोड़ पर
खत्म होती कहानी हुं
तुम दुसरी दुनिया के तिलिस्म हो
जिसका हल मुश्किल था
तब भी और आज भी
तुम आकाश का चमकता सितारा हो
मैं जमीन पर बिखरीं हुई कहानी
तुम महफ़िल में उजाला हो
मैं अन्धेरों में गुम हुई ,बीती रात हुं
जानती हूं अधूरा सा है ये किस्स
ये कविता ये अफसाना
बस इतना ही लिख सके
कमबख्त ये आंखे कभी
साथ नहीं देती है मेरा
भीग कर रास्ता रोक लेती है...
फिर कभी सही..
इस अधूरे किस्से को पूरा करेंगे...
फिर कभी इत्मिनान से ढालेंगे तुम्हें कविता में....

Har kisi ki ek prem kahani hai... Kabhi hontho par hansi hai to kabhi aankhon me pani hai..
ReplyDelete