वो रास आया क्यूँ जिसे हम रास ही नहीं
वो रास आया क्यूँ जिसे हम रास ही नहीं
क्या कहूँ तुझसे तुझपे मेरा हक नहीं
ना है तू मेरा, ना मैं तेरी हुई
क्यूँ हुई यकीन की बेआबरूयत
आस है उससे जिससे आस ही नहीं
दूर इतनी की खयालों में भी नहीं
रूबरू होना दूर एहसासों में भी नहीं
क्यूँ हुई ये बेसबब तोहीन-ए-मोहब्बत
पास हूँ उसके जो पास ही नहीं
खुमारी तेरे खयालों की इख़्तियार नहीं
रहते हरदम छाए निगाहों में जोर नहीं
क्यूँ हुई चाहतों की मेरी रुसवाईयत
वो रास आया क्यूँ जिसे हम रास ही नहीं
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